Sat. Oct 31st, 2020
मुशताक अहमद सलफी                                                               
मैंने बचपन से जिन उलेमा को देखा, सुना और उनकी मुहब्बत को जीवन का बहुमूल्य सम्पदा समझता रहा, उनमें एक नाम मौलाना अब्दुल मन्नान रहिमहुल्लाह का भी है।
जिन दिनों मैं इस लायक़ हुआ था कि आस-पास की बस्तियों में जलसा सुनने जा सकूँ और दीनी विषयों पर बोलने वाले वक्ताओं के वकतव्य से लाभ उठा सकूं, उन दिनों स्टेज की रौनक़ बढ़ान वालेे जिन उलेमा के नाम आज तक ज़ह्न में नक़्श हैं, उनमें मौलाना अब्दुल मन्नान साहब का नाम बहुत नुमायाँ है। मौलाना को उन दिनों कई जलसों की अध्यक्ष्ता करते हुए देखा था। वक्ताओं की तक़रीरों पर उनकी निहायत फ़ाज़िलाना, नपी-तुली और बरमह़ल टिप्पिणयाँ आज तक कानों में रस घोलती हैं। सुलझी हुई गुफ़्तगू, मोतियों की तरह अलग-अलग निकलते हुए शब्द और हर वाक्य के बाद ठहराव। ये था  बात करने का अन्दाज़!!
अब्दुल मन्नान बिन ह़ाजी मुस्लिम मुल्ला बिन ह़ाजी इस्ह़ाक़ बिन ह़ाजी यार मुह़म्मद। ये आपका हंक्षिप्त नसब नामा है।
1928 के आस-पास बसन्तपुर, गुआगाछी में पैदा हुए।1945 के आस-पास आपका परिवार सकरेली, बरारी आ गया। यहाँ कुछ दिन क़्याम करने के बाद चरखी जा पहुँचा, लेकिन पन्द्रह-बीस साल के बाद दोबारा सकरेली आ गया।
शिक्षा-दीक्षा की शुरुआत घर से हुई। कुछ दिन किशनपुर उच्च विद्यालय में भी रहे। फिर इस्लामिया हाइ स्कूल कटिहार में दस्वीं में पढ़ रहे थे कि घरेलू उलझनों के कारण अब्बा की तरफ से स्कूल की बजाय मदरसे में पढ़ने का हुक्म मिला। यूं आप इस्लामिया हाइ स्कूल से मदरसा मज़्हरुल उलूम बटना पहुँच गये। उन दिनों वहाँ मौलाना मुस्लिम रह़मानी साहब का फ़ैज़ जारी था। उनसे ख़ूब फ़ायदा उठाया। वहाँ कितने दिन रहे और किस कक्षा से किस कक्षा तक की पढ़ाई की, ये मालूम नहीं हो सका, अल्बत्ता इतना पता है कि वहाँ से उच्च शिक्षा के लिए अब्दुल्लाहपुर चले गये और शायद वहीं से फराग़त हासिल की। बाद में कल्कत्ता बोर्ड से फ़ाजिल की उपाधि भी  ली।
मौलाना अपने जिन शिक्षकों को बार-बार याद करते और उनका गुणगान करते हुए नहीं थकते थे, उनमें मौलाना मुस्लिम रहमानी, मौलाना मुस्लेहुद्दीन आज़मगढ़ी, मौलाना अह़मदुल्लाह और मौलाना शम्सुल ह़क़ बर्क़ शामिल थे। वैसे भी, ये ह़ज़रात उस समय पूर्वी भारत में इस्लामी उलूम के निहायत ही क़ाबिल मुदर्रिस की हैसियत से जाने जाते थे।
मौलाना एक मेहनती, लगनशील तथा माहिर शिक्षक थे। पूरी ज़न्दगी पठन-पाठन में गुज़ार दी। उनकी असल पहचान एक कामयाब शिक्षक ही की हैसियत से थी। फ़राग़त के बाद मदरसा इस्लाहुल मुस्लेमीन चितोरिया, बाँस गाड़ा तशरीफ ले गये और दस साल तक शैक्षणिक कार्यों से जुड़ रहे। फिर मदरसा तन्ज़ीमुल इस्लाम तिनपनिया में नौ साल तक प्रधानाध्यापक के तौर पर कार्यरत रहे। ये उस ज़माने की बात है, जब इन मदरसों की रौनक़ और शैक्षणिक गहमा-गहमी क़ाबिले दीद थी। चितोरिया, सेमापुर, धूमगढ़ और तिनपनिया के मदरसे छात्रों से भरे रहते थे। अमीर हो या ग़रीब, कोई घर ‘ओस्ताजी’ से खाली नहीं रहता था। अवाम में गज़ब का जोश होता था। काश वो दिन वापस मिल जाते!!
तिनपनिया में नौ साल रहने के बाद दोबारा चितोरिया चले गये। लेकिन बाद में इस मदरसे को बिहार स्टेट मदरसा एजूकेशन बोर्ड से मान्यता प्राप्त हो गई। हालात बदलते गये। धीरे-धीरे पढ़ने-पढ़ाने का माहौल रुख़्सत होता गया और शिक्षा प्रिय लोगों के लिए ज़मीन तंग होती चली गयी!! लेकीन नौकरी करनी थी, सो की और इसी मदरसे से 2010 में सेवानिवृत्त हुए।
मौलाना के प्रमुख शागिर्दों में मौलाना मौलाना अब्दुल क़य्यूम साहब (बावरा), मौलाना हज़रत साहब (बावरा) मौलाना ज़ुबैर आलम साहब (चरखी) तथा मौलाना अहमदुल्लाह साहब (चरखी) आदि शामिल हैं। अनौपचारिक तौर पर फ़ैज़याब होने वालों में डाॅ सईदुर रहमान साहब (प्रधानाध्यापक हरीशंकर नायक उच्च विद्यालय) और मास्टर नज़ीर हुसैन साहब (सहायक शिक्षक उच्च विद्यालय कटीहर) आदि भी शामिल हैं।
मौलाना अब्दुल क़य्यूम साहब आपके दामाद भी हैं और शेरशाहबादियों में एक आदर्श अभिभावक की हैसियत रखते हैं। क्योंकि उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाकर ये सिध्द कर दिया है अगर मंज़िल को पाने का जुनून हो, तो रास्ते की बाधायें खास मायने नहीं रखतीं। डाॅ• शफी अहमद साहब उन्हीं के सुपुत्र हैं।
मौलाना अब्दुल मन्नान साहब को तफ़्सीर और हदीस से खास लगाव। अरबी अदब का भी ज़ौक़ रखते थ। क़ुर्आन से लगाव फ़रेफ़्तगी की हद तक था। बाक़ायदा ह़ाफ़िज़ नहीं थे, लेकिन कमो-बेश पूरा क़ुरआन याद था। नमाज़ में बड़ी लम्बी किराअत के आदी थे।
शुरुआती शिक्षा स्कूल में होने के कारण अँग्रेज़ी, विज्ञान, गणित तथा भुगोल से भी आश्ना थ। ये बात उन्हें उस ज़माने के अन्य उलेमा से अलग करती थी।
शांत मिज़ाज, बावक़ार चाल-ढाल, गुफ़तगू में नरमी, शरीअत के पाबन्द, तहज्जुद गुज़ार और पढ़ने के शौक़ीन। ये हैं चंद नुमायाँ विशेषताएँ!!
लोगों में मौलाना की मक़्बूलियत का अन्दाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि आप काफी लम्बे समय तक गाँव की जामा मस्जिद और सेमापुर मदरसा ईदगाह के इमाम रहे।
मौलाना को तीन बेटे और तीन बेटियाँ हैं। तीनों बेटे ग्रेजुएट हैं। बड़े बेटे मास्टर महमूद साहब उच्चतर माध्यमिक के शिक्षक हैं। वैसे तो शिक्षक रसायन शास्त्र के हैं, लेकिन संस्कृत छोड़कर हर विषय पढ़ाने का माद्दा रखते हैं, बल्कि पढ़ात भीे हैं। कर्तव्य निष्ठा का ये आलम है कि आजके “फाँकी बाज़” जमाने में भी क्या मजाल कि बिला कारण स्कूल नागा हो जाय। मौलाना के एक और बेटे मस्ऊद साहब बक्सर हाइ स्कूल के शिक्षक हैं।
मौलाना ने सेवानिवृत्ति के बाद हज भी किया और एक भरपूर ज़िन्दगी गुज़ारने के बाद 9 मार्च 2013 को इस दुनिया से चल बसे। अल्लाह उन्हें करवट-करवट जन्नत नसीब करे।
                           मुश्ताक अहमद नदवी

By sadique taimi

معلم

2 thought on “मौलाना अब्दुल मन्नान साहब, सकरेली।”

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